Thursday, September 8, 2011

हशिये पर है आतंकवादियों से लोहा लेने वाले दिल्ली पुलिस के अफसर




एसीपी राजबीर सिंह इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा की मौत से कमजोर हुआ नेटवर्क
बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद हुई फजीहत से गिरा मनोबल
उत्साह नहीं बढ़ाने से कोई नहीं लेता रिस्क
कश्मीर में रहा करती थी कि पुलिस की टीम
सतेन्द्र त्रिपाठी
नई दिल्ली। दिल्ली में आतंकवादियों के दांत खट्टे कर देने वाले दिल्ली पुलिस के अफसर आजकल हाशिये पर है। कोई सुरक्षा में तैनात है तो कोई बटालियन में नौकरी पूरी कर रहा है। बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद हुई फजीहत से पुलिस का मनोबल भी गिर गया है। एसीपी राजबीर सिंह इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा की मौत से नेटवर्क कमजोर हो गया है। स्पेशल सेल में तैनात पुलिस अफसरों का उत्साहवर्धन करने वाला भी कोई नहीं है। अक्सर कश्मीर में रहने वाली दिल्ली पुलिस की टीम भी अब वहां नहीं रहती।
आतंकवादियों को चुनौती देने वाला स्पेशल सेल आजकल चोर-बदमाश पकड़ने के काम मंे लगा रहता है। आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देने वाले एसीपी संजीव यादव सुरक्षा शाखा में, इंस्पेक्टर मनोज दीक्षित को बटालियन से अपराध शाखा, साहुल साहनी अपराध शाखा, भूपेन्द्र सोलंकी तीसरी बटालियन, सब इंस्पेक्टर विनय त्यागी पहली बटालियन, एएसआई राजकुमार कौशिक सुरक्षा, एएसआई अनिल ठाकुर पीसीआर अनिल त्यागी भी सेल से दूर है। ये ऐसे अफसर है जो आतंकवादियों से दर्जनों बार आमना-सामना कर चुके है।
ऐसा नहीं है कि इनके बाद स्पेशल सेल में जांबाज अफसरों की कमी है। लेकिन पहले बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद हुई फजीहत फिर संयुक्त आयुक्त करनैल सिंह के जाने के बाद सबका मनोबल एकदम गिर गया है।  
सेल के अफसर कहते है कि अगर मोहनचंद शर्मा की एनकाउंटर में मौत नहीं हुई तो पुलिसकर्मियों को ही जेल जाना पड़ जाता। क्योंकि हालत ऐसी हो गई कि कोई अफसरों को सुरक्षा देने वाला नहीं है। एनकाउंटर करने वाले अफसर कोर्ट की तारीखें भुगत रहे है। कोर्ट में इनके मामलों की ढंग से पैरवी तक नहीं हो पा रही है।
मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश मुंबई जैसे यहां पर एंटी टेररिस्ट स्कॉवड को अलग से वेतन नहीं दिया जाता। सोर्समनी भी सही तरह से नीचे के अफसरों तक नहीं पहुंच पाती है। संयुक्त आयुक्त करनैल सिंह के वक्त में रिवार्ड भी जमकर मिलते थे। अब वह भी एकदम कम हो गए है। तो बारी से पहले तरक्की मिल रही है ही मेडल। इतना नहीं उपर के अधिकारी मातहत की सुरक्षा भी नहीं करते। फिर ऐसे में हालत में कोई रिस्क क्यों लेगा। ऐसे में तो चुपचाप नौकरी करने में ही भलाई है।
केवल इतना नहीं एसीपी राजबीर के वक्त में दिल्ली पुलिस की एक टीम अक्सर कश्मीर मंे रहा करती थी, जिसके चलते सूचनाएं लगातार मिलती थी। लेकिन अब वह सब भी बंद हो गया। दिल्ली पुलिस का जम्मू-कश्मीर पुलिस से कोई ठोस तालमेल ही नहीं है।




No comments:

Post a Comment