satudilse
Thursday, May 10, 2012
Tuesday, March 13, 2012
Monday, March 5, 2012
महाकाल की भस्म आरती के दर्शन से होते हैं भवसागर पार
मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित भगवान शंकर के द्वादश ज्योर्तिलिंग में से एक महाकाल की महिमा निराली है। मैंने उनके दर्शन तो किए थे, लेकिन उनकी भस्म आरती में शामिल होने का सौभाग्य नहीं मिला था। मन में बड़ी इच्छा थी कि कभी ऐसा मौका मिल जाए। एक दिन मेरे मित्र सुमित टंडन ने अचानक मुझे उज्जैन चलने के लिए कहा तो मेरी इच्छा जाग उठी। सुमित सिल्की टूर एंड ट्रैवल के जरिए लोगों के धार्मिक स्थानों के दर्शन कराने का काम करते है। उज्जैन का सुना तो बस फिर क्या था मैं परिवार सहित तैयार हो गया।
निजामुद्दीन से इंटरसिटी एक्सप्रेस से करीब ३० लोगों का ग्रुप उज्जैन पहुंच गया। वहां पर हमे स्टेशन पर कारें मिल गई तो महाकाल मंदिर के नजदीक होटल महाकाल पैलेस में ले गई। वहां पहुंचते ही भस्म आरती में शामिल होने की तैयारी शुरु हो गई। सुमित ने बताया कि आरती में शामिल होने के लिए पास बनवाना पड़ेगा। पास के लिए कोई न कोई परिचय पत्र चाहिए। मैंने अपना, पत्नी व बेटे का परिचय पत्र दे दिए। पास बनकर आ गए।
ग्रुप के सभी लोगों कह दिया कि अब आप लोग उज्जैन दर्शन कर सकते है। उज्जैन में हमने गणेश भगवान के प्राचीन मंदिर चिंतामणि गणेश, राजा भऱथरी की पुरानी गुफाएं, मंगल ग्रह के मंदिर मंगलनाथ, हरसिद्दी देवी, काल भैरव के मंदिर के दर्शन किए। यहां भैरव देव के मंदिर में उनकी प्रतिमा को शराब के भोग को देखा तो देखते ही रह गए। प्रतिमा हर दिन कितनी शराब पी जाती है, हर कोई हैरान है। विज्ञानजगत भी इसका पता नहीं लगा पाया है।
इस पूरी यात्रा हमारा ग्रुप साथ था। इसमें हमारी कार में राजकुमार व शिक्षक हरेश मिश्रा तो बेहद ही मिलनसार थे। इनके अलावा राकेश टंडन, रमन, संजय भाटी व गुड्डूजी भी अच्छे भक्तों में से थे। उज्जैन दर्शन करके हम रात को सो गए कि देर रात दो बजे उठना है। भस्म आरती सुबह चार बजे होगी। इसमें पुरुषों को सिर्फ धोती व महिलाओं को साड़ी पहननी होती है। ठंड के मौसम तड़के चार बजे लाइन में लग गए। भोले नाथ महाकाल के शिवलिंग पर पहला जल चढ़ाया तो अपार आनंद की अनुभूति हुई। इसके बाद नंदीगृह में जाकर बैठ गए कि भस्म आरती होगी।
आरती से पहले भगवान महाकाल का श्रृंगार होते देखा तो सब भाव-विभोर हो गए। ऐसा लगा कि भगवान शंकर साक्षात विराज रहे हैं। फिर आरती शुरु हुई तो अचानक मंदिर की बत्तियां बुझा दी गई। पुजारी ने आकर कहा कि महिलाएं व बच्चे अपनी आंखें बंद कर ले। इसके बाद भस्म से प्रभु महाकाल की आरती शुरु हो गई तो सब एकदम सांस रोके आरती देखते रहे। इस आरती के वर्णन करने के लिए किसी के पास कोई शब्द नहीं थे। ऐसा अद्भुत नजारा देखा कि सब दिल में बस गया।
इसके बाद हमारा गुप्र इंदौर पहुंचा और भगवान ओंकारश्वेर के दर्शन किए। नर्मदा नदी के तट पर स्थापित इस ज्योर्तिलिंग पर जल चढ़ाकर वहीं पर पूजा कराई। इसके साथ ही नदी के दूसरे तट पर बने प्राचीन ममलेश्वर मंदिर में ज्योर्तिलिंग के दर्शन किए। ऐसी मान्यता है कि इन दोनों शिवलिंग के दर्शन से एक ज्योर्तिलिंग के दर्शन माने जाते हैं।
निजामुद्दीन से इंटरसिटी एक्सप्रेस से करीब ३० लोगों का ग्रुप उज्जैन पहुंच गया। वहां पर हमे स्टेशन पर कारें मिल गई तो महाकाल मंदिर के नजदीक होटल महाकाल पैलेस में ले गई। वहां पहुंचते ही भस्म आरती में शामिल होने की तैयारी शुरु हो गई। सुमित ने बताया कि आरती में शामिल होने के लिए पास बनवाना पड़ेगा। पास के लिए कोई न कोई परिचय पत्र चाहिए। मैंने अपना, पत्नी व बेटे का परिचय पत्र दे दिए। पास बनकर आ गए।
ग्रुप के सभी लोगों कह दिया कि अब आप लोग उज्जैन दर्शन कर सकते है। उज्जैन में हमने गणेश भगवान के प्राचीन मंदिर चिंतामणि गणेश, राजा भऱथरी की पुरानी गुफाएं, मंगल ग्रह के मंदिर मंगलनाथ, हरसिद्दी देवी, काल भैरव के मंदिर के दर्शन किए। यहां भैरव देव के मंदिर में उनकी प्रतिमा को शराब के भोग को देखा तो देखते ही रह गए। प्रतिमा हर दिन कितनी शराब पी जाती है, हर कोई हैरान है। विज्ञानजगत भी इसका पता नहीं लगा पाया है।
इस पूरी यात्रा हमारा ग्रुप साथ था। इसमें हमारी कार में राजकुमार व शिक्षक हरेश मिश्रा तो बेहद ही मिलनसार थे। इनके अलावा राकेश टंडन, रमन, संजय भाटी व गुड्डूजी भी अच्छे भक्तों में से थे। उज्जैन दर्शन करके हम रात को सो गए कि देर रात दो बजे उठना है। भस्म आरती सुबह चार बजे होगी। इसमें पुरुषों को सिर्फ धोती व महिलाओं को साड़ी पहननी होती है। ठंड के मौसम तड़के चार बजे लाइन में लग गए। भोले नाथ महाकाल के शिवलिंग पर पहला जल चढ़ाया तो अपार आनंद की अनुभूति हुई। इसके बाद नंदीगृह में जाकर बैठ गए कि भस्म आरती होगी।
आरती से पहले भगवान महाकाल का श्रृंगार होते देखा तो सब भाव-विभोर हो गए। ऐसा लगा कि भगवान शंकर साक्षात विराज रहे हैं। फिर आरती शुरु हुई तो अचानक मंदिर की बत्तियां बुझा दी गई। पुजारी ने आकर कहा कि महिलाएं व बच्चे अपनी आंखें बंद कर ले। इसके बाद भस्म से प्रभु महाकाल की आरती शुरु हो गई तो सब एकदम सांस रोके आरती देखते रहे। इस आरती के वर्णन करने के लिए किसी के पास कोई शब्द नहीं थे। ऐसा अद्भुत नजारा देखा कि सब दिल में बस गया।
इसके बाद हमारा गुप्र इंदौर पहुंचा और भगवान ओंकारश्वेर के दर्शन किए। नर्मदा नदी के तट पर स्थापित इस ज्योर्तिलिंग पर जल चढ़ाकर वहीं पर पूजा कराई। इसके साथ ही नदी के दूसरे तट पर बने प्राचीन ममलेश्वर मंदिर में ज्योर्तिलिंग के दर्शन किए। ऐसी मान्यता है कि इन दोनों शिवलिंग के दर्शन से एक ज्योर्तिलिंग के दर्शन माने जाते हैं।
Tuesday, December 20, 2011
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