Wednesday, August 31, 2011

टपकेश्वर महादेव, जहां शिव ने द्रोणाचार्य को सिखाई थी धनुर्विद्या

सत्‍येंद्र त्रिपाठी, देहरादून से लौटकर। पौराणिक, प्राचीन आदि अनादि तीर्थस्थल स्वयंभू शिवलिंग टपकेश्वर महादेव श्री गुरु द्रोणाचार्य जी की तपस्थली द्रोण गुफा, देहरादून में स्थित है। पौराणिक श्री टपकेश्वर महादेव मंदिर, आदि अनादि तीर्थस्थल है। महाभारत युद्ध से पूर्व श्री गुरु द्रोणाचार्य जी के अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए हिमालय पहुंचे। उन्हें एक ऋषिराज मिले। उन्होंने ऋषिराज को दंडवत प्रणाम किया और अपना मनोरथ व्यक्त किया। मुनि बोले वत्स द्रोण निराश मत होवो अब शीघ्र ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। गुरु ने पूछा मुनीश्वर बताए कि मुझे भगवान शंकर के दर्शन कहां और कब होंगे।


ऋषि बोले हे द्रोण आप ऋषिकेश की ओर प्रस्थान करे, गंगा और यमुना के मध्य में तमा नदी बहती है। पूर्व में इस नदी को देवधारा के नाम से जाना जाता था। इस नदी के किनारे दिव्य गुफा है, जिस गुफा में आज तपेश्वर नाम स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है। पूर्व में इसी दिव्य गुफा में देवता लोग शिव आराधना किया करते थे और भगवान शंकर उन्हें दर्शन दिया करते थे। इसलिए हे द्रोण आप भी उसी स्थान पर जाकर भगवान शंकर की आराधना करो।

शिव ने दिया द्रोण को धनुर्विद्या का ज्ञान
गुरु द्रोण दिव्य गुफा में आ पहुंचे। कल-कल करते बहती हुई पवित्र नदी का पावन तट , जहां शेर व हिरन बैर-भाव को त्यागकर एक ही घाट पर पानी पी रहे थे। यह देखकर गुरु आश्‍चर्यचकित रह गए। आसपास की गुफाओ में अनेक तपस्वी कठोर तपस्या में लीन थे। गुफा में प्रवेश करते ही जो सुख की अनुभूति गुरु द्रोण को हुई, उसका शब्दों में वर्णन असंभव है।

गुरु द्रोण माता कृपी के साथ तपस्या में लीन हो गए। 12 साल की कठोर तपस्या के बाद भगवान शंकर स्वयंभू शिवलिंग के रुप में प्रकट हुए और बोले वत्स द्रोण मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं, वर मांगो। इस पर गुरु द्रोणाचार्य जी भगवान शंकर से प्रार्थना करते हैं कि विश्व शांति के लिए धनुर्विद्या का ज्ञान आप प्रदान करे। कहा जाता है कि भगवान शंकर रोज प्रकट होते थे और एक अध्याय धनुर्विद्या के बारे पढ़ाते और धीरे-धीरे गुरु द्रोण को संपूर्ण अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान प्राप्‍त हो गया।


अश्‍वत्‍थामा का जन्‍म
द्रोणाचार्य ने पत्नी कृपी को दुखी देखा तो कारण पूछा। पत्नी ने कहा कि हर स्त्री की इच्छा होती है कि वह मां बने। इस पर दोनों पति-पत्नी भगवान शंकर की आराधना करने लगे। भगवान ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। माता कृपी के गर्भ से सुंदर तेजस्वी बालक ने जन्म लिया। जन्म लेते ही उसकी आवाज अश्व की तरह थी और दूर-दूर तक उसकी आवाज गूंजी । अश्व की तरह आवाज के कारण इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा। बचपन से ही बालक अश्वत्थामा तेजस्वी, नटखट और बलशाली थे।

धीरे-धीरे वह बड़े होने लगे तो एक दिन घूमते-घूमते जगंल में पहुंच गए। जहां उनकी दोस्ती ऋषि कुमार से हो गई। एक दिन उनके सखा देर से खेलने आया। अश्वत्थामा ने देरी से आने का कारण पूछा, मित्र बोला मेरी माता गोबर से कुटिया में लिपाई कर रही थी। मां के दोनों हाथ गोबर से सने थे। मैं दूध पीना चाहता था और मां ने काम निपटाने के बाद मुझे स्तनपान कराया। मां का दूध पीकर आ रहा हूं। चूंकि माता कृपी को उस दौरान दूध नहीं होता था और गुरु द्रोण के पास गाय भी नहीं थी।


अश्‍वत्‍थामा का दूध के लिए बाल हठ
एक दिन बालक अश्वत्थामा जब एक ऋषि कुमार के साथ उनकी कुटिया पर पहुंचे तो देखा, उनके मित्र की मां गाय का दूध निकाल रही है। अपने सखा के घर प्रथम बार उन्होंने दुग्धपान किया। अश्वत्थामा जब वापस गुफा पर आए तो मां ने उन्हें चावल का मांड पीने को दिया। मांड को पीने से बालक ने इनकार कर दिया। वह बोला मुझे अपना दूध पिलाओ। कृपी मन ही मन परेशान हो जाती है। आज तक मेरे बच्चे ने कुछ नहीं मागां और आज मांगा तो मेरे पास कुछ नहीं है। जब द्रोण को सारी जानकारी हुई तो वह गाय के लिए हस्तिनापुर (वर्तमान मेरठ) में गए।

भगवान की लीला से राजा द्रुपद ने उन्हें गाय देने में असमर्थता व्यक्त की। गुरु द्रोण निराश होकर गुफा में पहुंचे, तब तक माता कृपी बच्चे को पिता के आने पर दूध के लिए धैर्य बंधाने में लगी हुई थी। द्रोण के आते ही आशा की किरण ख़त्म हो गई। द्रोण ने कृपी को समझाया कि भगवान शंकर ही अब इसकी इच्छा को पूर्ण कर सकते हैं। उन्होंने बालक को समझाया कि मैं गाय लेने गया था, किंतु सारी की सारी गाएं तो भगवान शंकर के पास है।

अश्‍वत्‍थामा की कठोर तपस्‍या से गुफा से बहने लगी दूध की धारा
अब तुम उन्हीं की आराधना पूजा से दूध प्राप्‍त कर सकते हों। अश्वत्थामा के मन में भक्ति की लौ जल गई और वह एक पैर में खड़े होकर कठोर तपस्या करने लगे। भगवान आशुतोष शंकर उनकी परीक्षा हेतु सन्यासी के रूप में प्रकट होते हैं, उनका दिव्य तेज चारों और फैल जाता और उनका मनोरथ पूछते हैं।


तब अश्वत्थामा दूध का मनोरथ बताते हैं, किंतु सन्यासी अंतरध्यान हो जाते हैं। बालक निराश हो जाता है। माता पार्वती बालक की कठोर तपस्या से द्रवित हो गई। उधर बालक की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। अनायास ही आंसुओं से शिवलिंग का अभिषेक हो गया और भगवान शंकर माता पार्वती के साथ प्रकट हो गए। गुफा से दुग्धधारा प्रवाहित होने लगती है और शिवलिंग का अभिषेक करते हुए दूध नीचे गिरता है और शिवलिंग दूधेश्वर नाम से विख्यात हुआ और अश्वत्थामा की दूध की अभिलाषा पूर्ण हुई।

अब बालक अश्वत्थामा कुमार अवस्था में आ गए थे। वह पिता से अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान लेने लगे। गुफा से प्रस्थान से पूर्व गुरु द्रोण ने सपरिवार भगवान शिव की आराधना की हे देवेश्वर, हे तपेश्वर, हे दूधेश्वर जिस प्रकार आपने मुझ पर कृपा की, उसी प्रकार की कृपा आप कलियुग में भी रखना। मैं अज्ञानी था, आपने मुझे यश दिया, मैं नि:स्तान था, मुझे आपने अश्वत्थामा सा वीर पुत्र दिया, बाल भक्ति के आगे आपने पहाड़ से दूध की धारा प्रवाहित कर दी। भगवान शंकर बोले हे द्रोण कलियुग में भक्तों को साक्षात दर्शन तो नहीं मिलेंगे, किंतु भक्तों की सभी मनोकामनाएं, सच्चे मन से की गई पूजा-अर्चना जलाभिषेक आदि से पूर्ण होगी।

क्‍यों पड़ा टपकेश्‍वर महादेव नाम(Tapkeshwar Temple)
दूध का क्रम कलयुग तक चलता रहा, कलियुग के प्रभाव से लोग दूध का गलत उपयोग करने लगे। मां पार्वती ने भगवान शंकर को महासमाधि से जगाया और भगवान शंकर ने भक्तों के कल्याण के लिए दूध की जगह जल की धारा प्रवाहित की, जो गंगा जी का ही स्वरूप है। दूध की जगह पवित्र जल गिरने के कारण यह शिवलिंग टपकेश्वर के नाम से प्रचलित हो गया। इस कारण गुफा के अंदर गिरने वाले पवित्र जल को छूना मना है, जिससे भगवान शंकर का अखंड अभिषेक खंडित न हो। आज भारत से नहीं संपूर्ण विश्व से श्रद्धालु इस स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन के लिए आते है और अपनी मनोकामना पूर्ण करते है।


यह स्थान द्रोणाचार्य की तपस्थली के रुप में विख्यात है। टौंस नदी के तट पर स्थित प्राकृतिक स्वयंभू स्थान की छटा परम् शांति प्रदान करती है। यहां पर बहती टौंस नदी को देखकर लोगों को अद्भुत लगता है। यहां पर कुछ अन्य मंदिर भी स्थापित हो गए हैं। यहां के पुजारी भरत गिरी जी बताते हैं कि एक बार श्रावण के सोमवार के मौके पर एक नाग ने भगवान शंकर के शिवलिंग पर आकर भक्तों को भाव-विभोर कर दिया था।

कैसे पहुंचें
दिल्‍ली से शताब्‍दी, जनशताब्‍दी, देहरादून एक्‍सप्रेस जैसी सीधी गाडि़यां जाती है। इसके अलावा सड़क मार्ग से भी राज्‍य परिवहन निगम और वॉल्‍वो बस सेवा दिल्‍ली से देहरादून के लिए उपलब्‍ध है।

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